गास्वामी सुलसीदास

गोस्वामी तुरुदास

लेखक श्यामसुदरदास पीरतावरदत्त वड्वाल

प्रयाग

दिदुस्तानी रुकेडेमी, संयुक्त मात

एप11596 एए 6 प्पावप्णाडणा 4९०वश्फफ, 0 2, 41181808

ि78# एवाध्रणप एप०० 7७ | --

वल्य # 2086, 1 706 व्‌180 7688, 110 ,

8687885 27800 2368788

भूमिका

गत फई वर्पौ मे गोस्वामी तुलसीदासजो कौ जीवनी फे स्वध घ्रनेक नई वातौ का पवाल्तगा रै शरीर उसकी बहुत कुं जांच पडताल रै। भेरा पिचार था फि इस सव सामग्री का उपयोग हडियन प्रेत द्वारा प्रफागित्त सटीक रामचरितमानस के समोधित सस्करण के छपने पर उसकी प्रस्तावना में फरता, पर श्रभी उस संस्करण फो छपने मे विलव जान पडता द। इधर हिदटुस्वानी एकेडमी ने यह इच्छा प्रकट को सि रँ मोस्वामी तुलसीदासजी को एक छोटा सा जीवन-चरिति उनकी पुस्वकमाला फे लिये किस इस बात फो क्षगभग दे वर्ष दते ई। श्रन्य कार्यो मै व्यस्त रहने फे कारण श्रव तक इस कायैषोमफर्‌सकाथा। श्रव श्रपने योग्य शिष्य पडित पीर्तावरदत्त बडथ्वाल की सहकारिता तथां सहयोग से यद जीवन-चरित तैयार हा गया श्रौर पएकेडेमी दवाय प्रापित दा रहादै। टम लोगो ने भ्रव तक फी उपलब्ध समस्त सामभ्री फा उपयोग में लाने वथा गे्रामी तुलसीदासजी धे एक सुश्सल जोवन-दत्तौत फो प्रुत करने का उद्योग किया ह, साय दी उनके जीबन पर एक व्यापक दृष्टि डालमे का प्रयास किया समे कां तक सफलता दुई है, यद दूसरा फे कमे फौ वाव काशी |

२५-४-३१ पयासञुदरदाख

१९१ ण्ट ३० २. धद ६९

९०२ १२० १४१ ९७२. १८४ ९८६६ २०६. २११ २९१८ २४<

चित्र सुची

पृष्ठाक १) गोखामीौ तुलसीदास फा चिन ( २) पचनामा १०९ ( ) बाल्मीरोय रामायण फा श्रतिम पृष्ठ ११४ ( धं ) रामायण का राजपुर श्रीर्‌ श्रयोध्या कौ प्रतियों

के कुद परो फे चिव ११६

गोस्वामी वरूसीदास्ष

( १) श्राविधाव-काल

मप्य युग षौ हद्‌ धर्मद्धारफो सथा द्िदी कविय मे गेला तुलसीदासरजो का परिभेष स्थान 1 उनका जन्म दी मनि पिनाशा- न्युख हद्‌ धमै कौ सता फे लिये द्श्राथा। अ्रसदिष्णु सुमलमानं फे घोर श्रयाचार से पीडित जनवा फी ग्रागा-ृत्ति, सवं दिशम कौ द्वार दे पाकर, उस्त एकमात्र दिशा कौ श्रोर मुडा, जिसका हषर यद करना पिसी षषे साम्यं मे नरी रै। भगवान्‌ के श्रतिरिक्त समीर कौन निपको को श्राश्चाको श्रयतेव सक्ता रै भ्य मै धपदेशका की कभी कमौ नही रही, षर धमपदेशवों की याणी इम श्रापत्कालं मे जनता फो विपरोप मनेधुग्धरारिणौ प्रतीत हई उमी मपय भक्ति कौ गगा, ण्वः छर से दृसरे छार गक, सर देश फे श्रष्ठायिद करती टदै; बडे बेग भे बरने लगी

भक्ति फा जलण्कद्ी फाटमे नदा बदा! इमकी दे शावा फृढ पडा--एक निर्शुण शरैर दृसरो सगुण निगु शाखा विराग को! लेकर चन्ली } तब्िरक्तिजनकं परिस्थितियों फे कारण पद्मे परेन जनता को उसम श्रधिक श्राप दिखाई दिया} शिव्‌युश्लिस- फेस छी मधुर भावना भी निर्ुणमाव को प्रयत्त परिणाम थौ पर सिरुणे सक्ति शापा जनता फो जिम श्रानेद्‌ भै निमल्नित करना चारी घो षर सर्वा पार्थि या} उच्च श्रेणी की व्यक्तिगत साधना कै बिना उसको प्रप्र ररना रसस था इसलियै भि्ुणधासा

मोष्वामी तुनमीदास

जनसाधारण के धरम का स्थान प्रर फरने श्रसमथै थौ लषोफ धर्म परिपक्व शरीर अपरिपस्ब सभी प्ररार गी चैतनात्नों को साथ लेकर चलता है, पर निर्गुण मार्गं णेता नहीं कर सकता निरंण फे विली त्तेन मे भक्ति का जल वरय फैन जाता है, पर उसकी गहराई कम जाती रै। रिद्‌ मुसलमान अ्रादि मभौ जआवियां निर्युण पथ मे सम्मिलित होने तिये स्वतत् था, पर सभी जातियां मभा नेग सभावत उममे मम्मितित नह रा सकते थे।

इखम यट निष्कं महा निकानना चादिण कि निर्गुण पथनेाक विरोधा स्यर्पको लेकर चलाथा। णमा कग्ना निर्गुण पथ फे प्रयसा उदेश्य से घोर ्रनभिदता प्रकट कग्नार। नि्गुणिये मै लाक फा उतना ही पिरोध प्रिया जितना वह पिरोध लाक-सरनण सायर रो सकता था तथा जितने से लार ग्रपनी पारमार्थिक मत्ता फान भृते] लोक का लोकत्र जलँ लोफत्व दी के निये रै वहाँ वर स्वायै वृत्तियो से त्रभिभूतदाजाता। णेसीदशामे नवह ग्ताकिण्जाते के योग्य रत्तारैश्चीरन इमा योग्य फि सजय श्रपनी स्ता कर सङफे। धरम श्रदुभूि रो प्रिषय ट, कितु नोरुषर्मे मै श्रनु भृति प्रिनाभी धर्म को घ्रे प्रवृत्ति दिमराना ण्क सामाजिक गुण ४1 गजशक्ि कीश्रारसे सारी जनतामे णदी धर्म के प्रतार प्रयत्न कं मून मे भौ समयत लोफ-मप्रह कौ दा भावना हा। परनुश्रनुभृषि हीन वैराग्य धर्म उस लोर विरथी स्पम प्रकट दोता दज समाज कौ श्ना का ताड देवार! निर्गुण पथ के प्रवरतक कवार सारदे भो उस सभावना फे तिये श्रांख वद किण हेण नटा घ। गुद बनकर समाज खव ययनांसे पर दाजानं इक श्रलुमृति दान वाचक क्ानियों को द्धा ल्य कफं करार नेकटाधा--

पन्र्यो काठ सद्ह तग उर, मादि दिन सय नानी ॥१

श्राविर्माव-कान 3

शलाय सारिदि घनाय दर इत दत शच्दरं काट, यथरीर कर ल्य जि जूरी पसल चाट ।'' पे ्ञानिये से ता ससारी भला, जे परमास्माके भय से लोर मर्यादाकेपेरेमे रटतार। सन्ञाना सूल वाया श्राप जण करता तापे सवारी मला जे रहै इर्त ठुनसीदालनो के यमय मै यर दिरतरा ज्ञान बहुत पन्ते गया धा! उन्दने देम फि-- भ्रमन्न तिनु नारि नर कटि -इ दृखरि यात्‌ ५, लोक के तिये भर्यादिव भ्रुति-मम्मत धर्मं फे रतम जे भक्ति का गार्गं चलाया गया रै उमा तिरस्कार करये लाग नानाप्रकार मनमान॑ पथ चनाने लगे ¦ शरूति सम्मत रि भक्ति पथ सयत मिरती परिगम तेहि प्रिहरष्ठि तरिमेष्ट कंप्पहि पथ शनक)" चेद श्रीषर पुराणे कौ निदा करना इन लागो का एक श्राक्रपरयकर लनणदि नाथा! उसीमै नाग श्रषने को एत्य समक ये श्र वाश्छविक मक्िमिव से कासं वृर ग्रे च-- “साफी सनदी देहरा, कदि रिदनी उपण्याय भगत चिूपदि भगति दरि, निदृष्टि वेदे पुरान ॥" दम लाक द्रोही कूप का निरारूरण आपरयक या) ताक धम की प्रतिष्ठा सगुण भक्ति-मासा दी के द्वा ममर धौ जिन परिग्यितिया मे जनता भगवान्‌ को भ्रारण म्र जानै की भेग्णाकौ श्री उनरू निसकरण्‌ पिना जनता विश्वास निय धार नहा मिन सक्ता था तिरुणात्मफर समारकं कष्टोका निरुण नय भौ सगु सायन कं दी द्रास दृर्‌ कर मकवा ! किस प्रकार निर्यं नह पर इच्छा का अदिप करते पर्‌ भी वह मदुष्य

; गेखवामी वुनसादास

ही राथा से पूरणं हा सकती ₹। लोक-कल्याण के कायो मे प्रवृत्त करने श्रौर होनेवाली शक्ति मे हिदू न्म का सगुण रूप देमते है 1 राम श्रीर फृप्ण जाने कव सै उनके भक्ति-भाय शरीर विश्वा्त को श्राधार हा रहे ई। फिर क्तोग राम श्रर कृष्ण को घ्रोर सुडे। वैष्णव भक्ति ने भगवान्‌ के इन्टी सगुण रूपों को लेकर सारेदेशको परिष्ाविव किया ! निवार्काचाय श्र वल्लभाचार्य ने कृष्ण की भक्ति को शरीर रामानद ने सीता राम कौ भक्ति फो प्रधानता दी। भक्त कवियों मै उनका ्रनुसरण फिया। इस प्रफार्‌ सगुण धाया कौ कृच्ण भक्ति श्रौर राम-भक्ति दे प्रशसा" हई

निरु धारा ता मिवृत्ति-मार्ग फो लेकर चना हा थी \ कषा भक्तिने भो प्रदृत्ति-मार्ग कौ उपेन्ताकौ। कृष्ण भो लोर कल्याग काणरूपमप्रकटहुण्थे। कर्ममार्ग से त्रिमुखं हाते देए श्र्जन को उन्ने प्नन्याय दमन के तिये श्रौरन्यायकौरनाकं निये युद्धमे प्रत्त शिया धाश्रीर्‌ खय उसमे उनरौी सरायता कौ थो] कृष्णक इसा स्वरूप को देखकर मजय ने बरस दुर्योधन के पिता धृतराष्ट्र से यद कटु सत्य फा घा--

यत्र यागन्वर ङृग्णो यघ्र पाथा धनुध॑र त्र श्राविजपो भूत्या नीनिमतिमम गीता १८, ७८

इमरूप को श्रार फष्ण-मक्ति ने ररि नरी ठटसयाइ रुषा कौ वान क्रोडा श्रैर रामनानात्रां मे दा रसने श्रपनौ कूनरार्यवा सममी मूर इन्यादि कृ भक्त रविर्यो न॑ दप्ण के जवन तिम श्रानिद्‌ विन्दौ प्रगका मामन रप्पा उमम सनुष्यको बामनाको ना नद्‌ कौ श्रपे्ा श्रधिरु कृप्नि श्वय मिना, पग वट लेक के श्रधिक कामकानद्ई। श्रागे चलकर दिदी कविनाम दृष श्रीर राथा मदां तिये रिसा नायरू-नायिकाका भ्यान प्रटण करने

अ्राविरभाव-काल

क्ते घमौटे गए लोर-मग्रह के भावा के स्थान पर उसने जनता के सुग फौ विलासप्रियता कौ नर्न करने कौ ये्यता प्रदान की। जिस शक्तिकं कारण ुमलमाना ने भारत फो वभव को च्रपनाया था श्रीरः ञ्रय वे येपर्के विलासी है रदं थे, उसके उत्पादन शरीर सदुपयोग कौ विधि फे ज्ञान कौ श्रावप्रयकता न्नभी तक वनी ददै थी।

निनं समय भारत के यैभव पर न्ध सुखलमान ने पण्चिमेत्तर से इम देश पर्‌ श्राक्रमण करना श्रारभ करिया घा, उम ममय उनसे उतना भय नहा था, क्योकि बह बाहरी आव्रमण था श्रीर उसक प्रतिराध का उपाय भीरो सताधा] भारतीये ने श्रत तक उमा उपाय पिया भौ उनके उपाय कं विफन दान पर भौ सुमलमा्नो फी विजय कंगन ग्मारीरिक जयथ] भारनीयेों की आत्मा श्रव तक अजेय सिद्ध रद! भारत कौ ब्रात्मा को जोतनं का उपक्रम मुगनो के समयमे दह्श्रा। मवश्रडाकोाण्क दही साथ पनेकौब्राभासे मेने कश्रड देनेवानी र्गी को काटने की मूर्य॑ता का श्रनुभय गेरणाह को पर पन श्रा श्रकपरने उसकी नीषि को चरम सोमा तकः परहैयाया श्रैषर भारतीये कौ शर्मा को बिजय का श्रीगणेश हुश्रा परिचमेत्तर के स्थूल श्राक्रमण मै सृद्स रूप धारण कर मारत के कंट्र दिघी शरीर ्रागरे फा श्रपना प्रधान स्परान बना निया स्बाधीन मेता दुरे की वेडियोँ सेने की कर दी गड्‌ शरीर मे मब उन्हं गहमै समभर चाह से पनम लग गए मानमि सरीसे कई बीर्रेठ राजा ्रक्यर बादशाह कौ नौकरी करना श्रपना सौभाग्य सममन लगे नारौ श्रीर्‌ णिल्ना कं वाचम वेह त्रनिष्टकारी मयथस्यापितदहा गया जा भ्राजभां रमारे राष्ट्रीय जीवन का अभिश्चाप हा रहादहै। शरिना सस्कृति का सवध नरह गयाथा\ मातापिता भ्रषने वालों कोा वही

, गोस्वामी तुलसीदास

ही राथा से पूणं हा सकती लोक-कल्याण के काया मे प्रवृत्त करने प्रौर होनेवानी शक्ति मे हिदू नष्यकासगुग रुप देमते है राम श्रौर कृष्ण जाने कव से उनके भक्ति-भाव श्रीर्‌ विग्रासत के श्राधार हा र्हेरै। फिर क्लोग राम शरीर कृष्ण की श्रार मुडे। वैष्णव भक्ति ने भगयान्‌ के इन्दीं सगुण रूपो को लेकर सारेदेशको परिषठावित्त फिया 1 निवार्काचार्य शरीर वल्लभाचार्य ने कृष्ण की भक्ति को श्रैर रामानद ने सीता राम को भक्तिको प्रधानता दौ। भक्त कवियों ने उना श्रनुसरण पिया। इस प्रकार सगुण धारा कौ कृष्ण-मक्ति श्रौर राम-मक्ति दो प्रशासे हुई

निर्ग धारा ते निदृत्ति-मार्ग को केकर चलौ ही धी, कृषा भक्तिने भी प्रवृत्ति-मार्ग को उपेनाको। कृषा भो लोक कल्याण कारारूपमप्रकृट ण्ये कम मार्ग से व्रियुख हेते दए श्र्जुन का उन्टोनै श्रन्याय फे दमन फे लिये श्रीर न्यायकोरलाके निय युद्ध मे प्रवृत्त क्रिया थाश्रार स्वय उसमे उनकी सहायता कौ घी। रृष्ण फो इसा स्वरूप को देखकर सजय ने वरस दुर्याधन के पिता धृतराष्ट्र से यद कड सत्य रटा था--

यघ्र यागेम्वर ष्णो यत्र पाय! धनुधर लवर श्राविजया भूतीभरवा नीतिमतिमम गीना १८, ७८।

दमरूप रौ श्रोर पृष्प-मक्ति ने ररि नटा ठटसाई छपा कौ वान प्रीडाश्नं श्रार गमनानाचां मे ही उमने श्रपनी एतरार्यता समभ सृर इन्यादि कृष मत्त कविर्यां कृष्ण जोयन ते तिम ॒श्रनद्‌- दिनादौ श्रशका मामन रम्या उससे मनुष्य कौ वासना का त्र्या मद्‌ का श्रपेचरा श्रधिरु वृक्नि श्रगश्य मिनी, पर वहे नोक प्रयिक कामकोन हद्‌) श्रामे चन्यं दिदौ क्विताम टृष्यश्रारराधा मदा के निये पिनामा नायङ-नायिकाका म्थान प्रण करनं

स्माविमवि-फान धूः

लिये चसद मए 1 लोक-पपरद्‌ भवेः कं स्थान पर उतने जनता के सुगो की मिलासम्रिता कौ नरुन करन कौ येग्यता प्रदान मनै! पिस भक्तिकं कारण सुसलसाने ने भर्त पे वैय का प्मपनाया था श्रीर्‌ अव वर येखटके विलासी हे रटे धै, उसके उत्पादन शरीर सदुपयोग कौ विधि कँ ज्ञान कौ श्रावश्यकता अभोतक वनी द्रे घौ)

जिस समय भाग्त के वैभप्र पर टुन्ध सुसलमानो ने परिचिमेक्तर से द्रम देश पर आ्ाव्रमणं करना श्रारम किया था, उम ममय उनसे उतना मय नहा था, क्योकि वह बाहरी प्राक्रमण धा श्चार्‌ उक प्रतिर का उपाय भोरे मङ्ताया। भारतीये न॑ श्रत तः उमको उपाय पफियाभो} उनके उपायकः निन दवान पर भी समलमानौ कौ विज्ञय कयन शारीरिक जययो। भसतोयोको प्मत्मा शन तक श्रजेय सिद्ध ददै! मारन का आत्मा को जीतम फा दपक्स सुगला के मम्यमेदहम्रा] सवष्डाकोण्कषही साध पनेकोश्राणासे सेने फं श्रड दनान युमौ फो काटमे कौ मूर्य॑ता का भ्तुमप भेर के पटले पदन रप्र अरुवर ने उससे नीति फो चरम सीमा दकः पटचाया श्रीर्‌ भारतीये कौ श्रात्माकोौ पजय को श्ीगग हुश्रा } परिचिभेपत्तर दो श्यूल श्मक्रमण नै सदम रूष धारणा कर भार केद्र दिघी श्ैहर आरे फेः अपना प्रधान स्थान वना लिया स्वधान मता हदु की वेदिर्यो सेमे कौ कर दी म्‌ प्रर श्रम बन्द गहनं समभर चाह से परनने सग गए { सान्ति सरोसे कू बीरे रजा श्रवर बादशाह कतौ मोरी करना श्रपता समाम्य मससन लगे ! नीरूमीः शचीर्‌ गिना वौनम बरे अनिष्टकागे मव स्यापिचदटा गया जे प्राजभी हमर राष्ट्रीय सौवन का अभिशाप दरद रै! शध से सस्कृति फासवधनरहगयाया) मादा-पिता प्न बालको कः की

गेस्ामी तुलसीदास

भिका देना पर्याप्त समभते भे जिससे वे अपनी उदर-पूरतिं कर सर ठल्तसीदासजी को यह बात विशेष असरी--

ध्मात पित्ता वालक-द बाटावहि।

उदर भरद सेद्‌ धर्म सिखायहि ॥"

हिदुग्र ने भी मुखलमानी वाना पहन निया जाँ तक्र केवन

युपा लेग हिद धमै पर्‌ ग्राक्रमण करते थे, वेद-पुराणो की निदा करते थे वहो तक ते विशे चिताकौवातनथो। प्रतु हिदुघ्रानेजब मुसलमान से इस बात को सीस लिया तर वर्णाश्रम कौ व्यवस्था शरीर निगमो के श्रनुशासन व्यवधान पडने का पुरा श्रायोजन हा गया, जिससे चिद धरम नौव हिल जाती। निरगुणियें फो वर्णाश्रम धर्म श्रीर निगमागम का विरोध बहत ग्रश मुसलमान प्रभाय का परिणाम था। युच्लामरा कौ मकल करणे हिद भी व्ीश्रम शरीर वेद्‌ पुराणा कौ निदा करना सभ्यता सा चिद्व समभने लग गण

4वरन धरम हि भाम चारी।

श्रुति चिराधरत सय नर नासी

प्रतिष्ठित शज घराने कौ लडक्रियाँ श्रर्बर फे ररम को शाभा

वानं लगा कटर हिदृ कौ रष्टिम इमस अविर दानता को रर्टत हद्दी नहा मङुताथा! महाराणा प्रताप कं श्रफ्वर फो उसका फफा करने पर मानमि ललित हाने फं वदनेकद्ध द्त्राया श्रार परिणाम ग्रा हद्धाधादी कौ लडाई रद्दराधारी कानडाईम हिदुच्रा का पिदेशो शक्तिके व्रिराय श्रख ग्रहण करना रम मृदम साम्छक युद्ध का भ्वून व्यक्त स्पथा जिमम हिदृ हिुत्र पग श्राकमण कूर गह थ। पर यह पिराय देगव्यापा नटा था। ईम्मम गटाय भत्रना का भाव धा सृक्म भव नेत्र 1 हान्ान इम मास्टूनिक मयपम हिदुत्का शरपनाग्नाक निय प्तापममभा वड याद्धा का श्राव्ययकतां घौ, जा कयन कु राजपूतों

श्राविभौव-काल

को दी नकत, भरस्युत मपू पद्‌ समाज कत अपम रूडा के हि गितं करता तुलसीदास फे रुप मे बर योद्धा प्रकटं ह्रा। प्रतु यद सममना चादिए फि चुल्लसीदामजी को धर्मे कं नाम पर यैमनस्य वाना त्रभो् घा इसके विपरीत उन्टोने करी भी इय तात फा श्मामाम नरी श्राने दिया है, मयोफि जानते ये कि ताममिक बृत्तिया कौ जागर्ति कर जा स्फृति' इत्यन्न की जातो रै वह ्णस्थायिनी होती रै, शरीर जते जाते श्रपने ब्राश्रयका श्रीर भौ नि्भू्न वनाकर छोड जाती र! इसके श्रतिरिक्त धर्म-मिरध त्द्‌ धर्म के सिद्धानां कौ प्रतिङृन ३। इसी लिये गीवामे का क्षि जे धमै श्रैप् वर्मा का विरेषो रे वह धर्म नरौ, श्रधरमै है। ठुनसीदासजी ने जिस माम का अपनयन किया उसमे समय तौ आवण्यकता शार न्याय समतसा दनि का ध्यान रणा गया था। स्वय वन्‌ का सपादन कर विरोधी के प्राक्मर्णोको अटल मरते दण उनी व्यता प्रदभिव करना वे उचित समभते ये, जिमते बह स्ययसेय श्रपने विरोध को छौढ दे।

दमे लिये यह प्रावश्यक था किरि समाज कां परतितावस्था से द्वार करियाजाय। जैसा हम उपर देय चुक ४, श््टु्नो की परमुपापिदिता कौ कारण उनका जे पतन हश्रा था उसमे जीपन के सभौ मिमाों नँ व्यायत दाज्ञा था समाज मे उच्छ खलदा बे गड थो शौनकी विगर्रणा श्रीर्‌ बिनासिवा की बृद्धि दा रही धौ! प्रसदिषणः विदेशी र्गा का त्ते करना दी क्या, स्वय हिद राजा माप्रजाके धन के लालचीये। वे प्रजाको चारित्रक चैर्‌ सा्छ- तिर ्रवश्यङ्वां को पूति करना ग्रपम्य धर्म नर समन्ते ये--

गोड गवार कृपाल कलि, जबरन महा भहिषाट सामन्‌ दामन मेद्‌ क्लि, वेल देड क्राठ)]। 9९ 4 1

[- गौघठामी तुलसीदास

द्विज श्रुति वच, भूप प्रासन 1; ॥; \, नरप पाप परायन धमे नही करि दड मिटद भना नितहीं॥* ब्राह्मण श्रौीर सन्यासी धर्म के स्तभ समभे जातेथे वेदी अपने कर्मैन्य से भ्रष्ट होकर धर्म के नाश पर तुल हण थे-- भ्वचिश्र निरच्छर ज्ञालुप कामी निराचार सट टषली स्वामी . + उुदाम संवार धाम जती विषया हरि ली-ह नीं रिरती ४" जसं पविन्रता का समावेश दाना चादिण था वदँ श्राचार हाते लगा था-- "सुरसदुननि तीरथुरनि गिरं ऊुचाट कुसाज ।'” दिदू समाज के इस शाचनीय दशा मे उवारने के निये तुलसी दामजी नै उसके सामने रागचद्रजी का पुनीत श्रादशै रसा राम चद्रजी फे चरित्र फे दवाय उन्टोने परमात्मा का वह कूप जनतां सामने रा जिमने जन-साधारण कौ धार्मिक वासना फो वप्र करते हण उनको लार-मर्यादा पान शरीर शीन-सपादन श्रादिरुर्णो कौ मधुर शिक्वादी। रमभक्तिक द्वारा उन्न उनफे ल्दयमे वह श्रागा प्रदीप्त फी निसकेद्वास वे परमात्माको पापका मार उतारनेक जियै श्रौर धरम कां प्रसार करने निये पृथ्यी पर श्राता हश्रा दैसें। धर्म इमौ शक्ति-शानी सदयं को राम मे देखकर राम-मय दाकर श्राज हद्‌ जावि जपित ६। रम पटने कद्‌ चु फि भक्ति का दे प्रयु शासं हई -- ण्क निर्गुण श्रीर दृमरी सगुण। निर्गुण शायामे ज्ञानमार्ग का

श्राविर्माव-काल

उद्षाटन करनेवाते कबीर दाद भ्रादि सत ट्ण 1 इसी शापा कौ एष दूसरी श्रतर्णासा प्रेममार्णा सृषी कविय फे रूपम प्र्टहः जिसने रहम्यमयी बाणी द्वारा आत्मा फा परमात्मा से सवरध प्रति- पादिते किया श्रौर उसमें लीन रोने कौ उसकी उत्कट कामना फा परद्ीम नायक-नायिका फे सीकिक प्रेम को कटानी फे रूप मे प्रद्‌- पि किया। सगुण शया कौ दा उपासे कूण-भक्ति ष्मीर राम-भक्तिकोरुपमे प्रवादित हद देश को विगेप परिरथितिथो के कारण सादि ने श्रव राजङ्ोय ्राश्रय को दयोडकर म्रभने पिकीस के क्लिये भक्ति फा श्रवलव प्रण फिया धा ज्ञानाश्रयी निगुण शाखा, जिसके लिये समार भ्रममाय था, मादय मे पिफोम फे लिये श्रधिक उपयुक्त मिद्ध हुई, क्योकि वाग्िनाम भौ उसके त्रिय मायाद्दी धा] निर्मुणियो के क्ञासीपन को शुष्कता फाव्य- सरितामे भो प्रतिवितरिसि टईै। प्रेम-मार्मी णप्या ने जगत्‌ फो पिद्कुल भ्रम मानरूग उसमें परमात्मा को प्रातिमासिक सत्ता दैसी जिसमे बाणो फे विस्तार के लिये जगह निकल श्राई। दम प्रकार सूफो प्रेममागौ शापा निगण फो श्रपेत्ता सगुण ग्रासा के श्रथिक मेन मे रही | कान्य के समुचिद पिरस को लिये मिस्दत नेत्रसशुण शापान्न दी पयार किया कृष्ण के प्रेम मे मस्त होकर यदेव, उमापति प्रादि ने ताने छेड उन्रेने बाणौ के पू यैमव षो दिखलारर जनता फे मन को मेद्द हिया 1 इन ताने के मेल मे भ्रपना सुर भिलाफर लोलापुरूप कृष्ण कौ विदार-स्वली से सृर- दास आदि कौ जा आ्राठे मधुर मुर्तियाँ वजो उनसे भत-सुग्य सौ देकर जनता ने श्रपना दुखडा भुता दिया राम-भक्तिने इस मधुर खात मे कमेण्यतां को धारा मिला दो! तुलसीदाम रामभक्ति पापा के सवसे सहत्त्पूं कवि उनम केवन रामचद्र फे कदे र्न मे दी भ्रपनी वाणी का विलास नं दिखाया, प्रत्युत उनी

स्‌

१० गोखामी तुलसीदास

श्रनत भक्तिको भी दृष्टि के सामने रया, जिसके साय श्रनत शील कास्योग होनेके कारण वह समाज की भ्थितिग््तामे सर्वथा उपयोगिनी सिद्ध हई वुल्तसीदामजी के काव्यो वाणी कौ शक्ति का सपू चमत्कार प्ररुट श्रा र। इसा श्रदुभुत श्र श्रसाधारण प्रतिमा के कारण उन्हे देश श्रीर काल कौ द्र सामाघनों का श्रति- क्रमगा जिया रै, जिससे विश्च भर कं विद्वान्‌ उनको श्रपनी श्रपनी श्रद्धा पुष्पाजलिं चढ़ाने के तिये प्रतिसपद्धा दिखला ररे

(२ ) जीवन-सामथी श्राजकन श्रात्म-चसिति लिने कौ प्रथा सौ चल गद 2, पर्तु दोनता्प्रय भक्तजन ्रपने जोवन कौ घटनाग्र का वुच्छ सममकर उनरी शरोर ध्यान नरी देते कफेदभी पेमा काम करना जिससे नाम भात्रको भी ्रास्मश्लापा प्रगट ते वै गरन समभते ई1 देसी दशा मे यर्‌ श्राशा करना कि भक्त-भिरोमणि तुलमीदामजी की स्वना से उनके जीवम-चसिति पर बहत प्रकाश पडेगा, निष्फने रा जायगी श्रपनी दीनता दिखाने के किये उन्हेनि स्थान स्थान परजा कु अपने विषयमे का भौ है उम धर मनमानी घट नामन को वैडाना श्रतुचिन ₹२\ ये भावुक उद्रेक मात्र भौ हे सकते है शरीर यदि घटनात्मक दए, तो भी जब वकं स्मे कोई अन्य साय नरी भिन्न जाता सव तक यद नहा करा जा सक्ता फि उनकं श्राधार पर किमी सच्ची घटन का निर्माण हमर श्रसुमान पो द्वारा शादी जायगा। चेमा कने से कभी कभो वीभत्म सयका भी श्माश्रय मिल जाता है जिमका मब से जवन्य उदाटरण निन्दा मिग्रजी कखन श्ए्ट के मायै मौने को सरस्वती पे प्रति “कवित्त रामायण मे गेपम्यामी तुक्तसीदाम काः श्रात्मयरित, भीप॑कः लेख ६, जिसमें “मातु पिता जग जाय सम्यो रिषि क्तिस्यो वु माल भलाद्‌1 ४, जाया इस गगन वधाय बजाये। सुनि भग्र परिताप पापजननी जेनर फो 11" श्रादि ग्रनरणे फो श्राधार पर यह सिद्ध फरमे फा प्रयत्न किया गया दि शु्सीदास किसी पाप्-कर्मै षे सवान्‌ थे इमनि लुनसो-

१२ गोखामी तुलसीदास

दासजौ कं जोवन का पुननिर्माण करने कं लिये म्रन्य उद्गमे का ही सहासा जेना पडता रै

सुनसीदासजी का सवसे पला वर्थैन नाभादासजी के भक्त- माल रै। नाभादासजी गोसाईूजी के समकालीन ये! उन्टाने उनके लियं वर्तमानकालिरु क्रिया का प्रयोग सियारे। गोाघखामी विदटुनेनाघजी के पुन गोस्ामो भिरिधरजौ का वर्यन भी भक्तमान मे वततैमानकालिक त्रिया में किया गया रै--श्री वल्लभजा के वशमें सुस्तर गिरिधर भ्राजमान ।' विद्रूलनाथजी सवत्‌ १६४० मे गोलाक- बासीहृएये। इसा वपं गिरिथरजी को श्रोनाधजी फौ गदी की दिकैती मिती हगौ इसलिये नाभाजी ने भक्तमान को शद फे लगभग ही बनाया होगा निस्सदेर्‌ इस समय तुनसीदासजी भो वतमान उनकी शर्यु सर्यसम्मति से सवत्‌ १६८० मे हुई शरीर उनके जन्म के पिपय जितने भी मत ई, सगङे अनुसार उनका जन्म १६४२ वहत पटले रो गया था प्रसिद्ध रकि नाभाजौ वुनसादासजा पर वडी श्रद्धा र्यतेथे शरीर णक बार श्रादर भापस उनके द्यनां के निये काशौभो आण्ये। पर, रेता किवदती रै कि, उम समय तुनसादासजी पूजा कर रहे थे शरीर उनस मिन सके। इम पर यिन दारूर नामादासजौ चने गण। करते पसि जव तुनसादासजी का कलाव श्रा तय वे वडे दुग हण्श्रीर नाभादासजो मिनन के निय चल पडे। अग ठुनमीदासजौ उनम रान पर पर्हैदे उम समय वदाँ माधत्रां फा मडरदा र्दा घा। तुलमादामजी साधुनां कापक्तिफे श्रव में चुपचापजारर वैटगण। यह वातत ज्ञात ्टान पर भी नामादासमा ने कुद उपना का मादर प्रदरिने मिया। परामते दए जव वे तुनमादासजी पान पटच वा पृद्धने नगे कि श्रायका ्सिपातम प्रसाद दूँ ठुनमीदामजा नं णक माधु कौ जुनी उठाकर कटा क्रि दमस

जोवन-सामम्रो १३

पवि दूसरा पाय से नही सकता! इस पर नाभिादासजी नै तुनसीदासजो गले से लगा क्तिया श्र कटा सि भ्राज सुम भकतमाल को सुमेर मिल गया यै अवर्य कुनसीदासजी के सवध मे बहुत तथ्य की वाति जानते ररे रोगे, पर अभाम्यवा उनके वशम इतने स्तेप सै निषदे गए फ्रि उनमे प्रणैसा कौ श्रतिस्कि पमार कु नरी श्रा पाया रै प्रत्येक भक्तं का वर्णेन एक णकः छप्पव मै किया गया 1 तु्सीदामजी को विषय मै उन्दने लिखा है-- “कलि कुटि जीय निम्ताए दित याटमोरि सुरसी मये प्रेता शाय निर्वै पशे सत वोटि रमायन दर भच्छर्‌ रच्च ब्रेद्यहन्यादि परायन श्रय भक्तन सुखदेन यहुरि वपु धरि (गीला) विम्तारी 1 रामचरन रम मन्त रेहत प्रदनिसि व्रतधारी संसार पार के पारक्य सुगम सूप पोकाल्परि | करिः कुटिट जीय निम्र हितं वाल्मीकि गुरसी भये ॥१» इससे अधिक से श्रधिफ यदी पता चल सकता कि तुलसीदास नै बास्मीफि के समान समाज फा कोई उपकार किया था प्र्थात्‌ समायण स्वा थौ जिससे वे कलिरान कं वान्मौकि हए, परतु इससे ुलसदासजो फे विपय मे रमारे ज्ञान कौ कु भी वृद्धि मर्‌ा हाती देखा जान पडता है कि स्वय नामाजी फे श्रपमे बैन ष्टौ सचिप्ता पटकती धी 1 उनी इन्दा थौ कि कोर उनका विस्तार फर! उनफे शिष्य वालक प्रियादास मे उनरौ यह्‌ इन्टा श्रमी गट ववी प्रर येोम्य होने पर सवत्‌ १७६६१ मे उसको पूर्वि को क्तिये उस पर श्रपनी टोका ल्िखी--

% सवन प्रसिद्ध दस साते सत उनदपर, फात्गुन भास यदी सप्तमी तिता फ़)

१४ गास्वामी तुत्तसीदास

षननाभानजु के श्रमिटाप पूरनलक्िमता 1; > २८ ५; तादी समय नाभाजुू नं श्चाज्ञा दुद, लद धारि, टीका विम्तारि भक्तमाट फी सुनादण ।* वास्तव मे प्रियादास कौ टीका, टीका नीं बर्कि भक्तमाल फो भक्तों फे चरित विस्तार का प्रयास रै जे कुठ साधु सतता से उन्दने सुना था उसी को श्नपनी टीका मे लिया रै "मति श्रनुखार क्या लद्यो मुख सतन के ।'* भ्यारह कविर्तो मे प्रियादास ने ठुनमीदास का चरित्र लिखा ये कवित्त नीचे दिए जपे ह्-- «निसा सा सनह पिन पूं पिता गह गड भूली सुधि दक भने वादी दौर धा हं यधू श्रनि लाज भद, रिस सा निरस गदै-- मीति राम नद तनष्टाद्‌ घाम छण ह, सुनी जग चात मानां गवा अभाव वह पाचै परचिताय तनि काशीपुर धाणह। शिता सप्रसुसरतैौ भ्गरातकीता कीना द्दृ मायनम रप क् तिमाण् ९०० गोच वजरोपपादभूतहू पिरप काञ कोट्या मुर मानि हनुमान जू वताण "तमायन क्या सा रसायन छान्नको श्रायन प्रयम्‌, पाद्यं तात, पणा द्ाए 1 जाद्‌ पिनि सग चल उरश्चानिश्राण यन मघप्य तानि घाद पाड पराण क्रं मनद्मर, कष्ट "मकागनररि्तो जान रम सार" म्प धरया जम गाणे ॥०१॥

जौवन सामप्रौ १५

पामि हले वर" कदी--ष्दीत राम भूप रूप

श्रत ्नूए नित नैन चभिटासिण" 1 किनि सैकेत वाहि दिन ष्टी सै टा हेत,

श्रां सेड्‌ समै चेत ववि चादिण प्राण रधुमाथ साय टबुमन चदे घोडे

पर रग वेरे रे कंसे मन रालिए्‌ पाद्व हनुमान चाए्‌, गरले देते प्रान प्यारे"

(ङु निरे मै ते' "भसे परि, भापिषएु ५०२ हतया घरि विप्र एक तीरथ करत श्राय

वष्ट सुख शाम" हया टारिप हव्यारे वो सुति धमिराम नाम धाम मं उलाद्‌ लिये

दिया कतै असाद क्वि सुद्ध गाये प्यारे के॥ भह द्विज समा, कदि बाटिकै पडो श्राप,

श्वेसे गयो पाप सगक्तैरकेजैएन्यारेषोा + श्वी तुमर्वाचा दिषु नाव नदि सचा धनू,

सात मति कचिी दूर ना करै ध्यारे को" ।॥ ९०३ देरी पोथी बाच नाम महिमा हू कदी साच

एयै ष्या करै कैसे तरे कदि दीक्तिए्‌ ! ष्याये जा प्रतीति कही "या हायज्ेयै जव

शिचनजूके तव पगति लीभिषए्‌॥ धार मे प्रसाद्‌ दिवे चले जर्हा पान किये

येते श्राप नाम के प्रसाद्‌ मति भीजिष्‌ जी तुम जानी ससी कैसे दै बखने च्रे

सुनि प्रसत पाये सै धुनि रीभिण ९०४ श्राण निषि चेर चेरी करन हरन धन

देखे श्यामधन हाथ चापर सर विषहे

१६

गोस्वामी वुलसीदास

जव जव श्चादै वान साध उरपावैण्त

श्रहि डर चै वलि दूरि विष है मोर चाय भूधे “रज सिरो किमोर कन,

सुनि कर मष रषे रासु डारि दिण् हं रट सत्र लुटाद जानि चैर राम राद दई

लद उह शिचा सुद्ध भण दिष्‌ ९०९॥ कयि तसु परिप्र व्याग लागी चली संग तिया

द्रष्ी ते देखि कयि चरन प्रनाम हे वाले ये। सुदागवती' “मरथो पति हों सति"

श्व तो निरुसि जाद सेवे राम रै" वलि कैङ्टय कटी श्जा प॑ भक्ति करो सदी

गही तय वात जीव द्वियो श्रभिराम दै भर्‌ सव साध व्याधि मेटी सै विसुख ताकी

जाकी वास रट तीन सूम शयाम धाम ९०६ दिल्लीपति धाद श्दिदरी पराण दैन

तादा से सुनाया सूम विद्र ज्यात जानिण। सिप के घाहं कोके मुखस निग श्राद्‌

कटी वहु प्रिनय गही चलं मन श्रानि९्‌ पटे भूपति पाव ्ाद्र प्ररासभ्िविः

द्वियो उच धायन दी याल्ये शु पानिप } दतै करामाति तण च्यात्त सय मात क्प

केटी कूर घात, णक राम पहचानिए ५०७ दुदी (रम केम 1 कटि कंद कपु किप दिष्‌--

^ निष्‌ कृ्रार हनुमान यू दयाल ठे 1 छठी मरम दर गदु दारि कयटिक्पिनष

नाच तन रमर चीर मये यां विहालष्टा॥

गोस्वामी तुलसीदास

पडत रामगुलाम द्विवेदी, पडित सुधाकर द्विवेदी शरीरः डाकृरग्रिम्न सैन तथा म्नन्य कई श्राधुनिर विद्वानेा ने वुलसीदासजौ के विषय मे वहत कुद श्रवु सधा रौ प्रवृत्ति दिखलाई पडित रामगुलामजौ मै श्रपने सु-सपादित रामचरितमानस की भूमिका कँ रूप मे तुलसी दाखजी का जीवन चरित क्लिखा धा! सुधासरजो श्चौर भिम्र्सन साय री सजे का परिणाम समय समय पर इडियन एेदिक्मेरी में निकलता रहा युश वैजनाधजीं त्रीर पडित महादेवप्रसाद त्रिपाठी मै मी फिवदतियें फो एकर कर उनके जीवन-चरित की कद सामग्री ्रतुव फी है।

परतु इतने पर भी तुनसीदासजो के जीवनचरित भिये कोई निशित प्राधार मिला मवत्‌ १८६६ की अयेष्ठ माम फा “मर्यादा मासिक पत्रिका मे वान्रू इद्रदेवनारायण ने ठुनसीदासजौ के ण्क बरहत्काय जोवनचरित कौ सृचना प्रकारित की यर मरारान्य गोसा्जी फे रिप्य वावा रघुबरदास का लिगा बताया गया था शद्रदेवनाणयणजो ने इस प्रथ का परिचय यें दिया था-

द्म प्रपदा नाम ^तुटसीपरिव द। यदह पद़ाष्टीृप्रयषट। सये शस्य चार्‌ सड ६-( >) श्रध, (२) कारी, (३) नमदा शीर ८४) मधुरा। इनम भी चनद ग्पक्चट ह। देम प्रयकी सेव्या मद्र लिषी रै

चौग्-ण्दः साप्तेतामष्रारा। नमै वाघः घुद्र उदारा

यष्प्रपमदामाएतम च्म नड! इमम गोन्वामीजी के तीवनचरित दिरवष् मुच्य सुद बून-न्‌ निय यनि लिने इ? £ इरी कित च्रव्यत सरव दार मनारचदरट। यद्‌ कदन चन्युभि होगी ङि गान्वामीनी द्विव रित्य मह्यम रघुरददरासी दिरचिच दय च्यादृरणीव प्रय की रिता धीरामचरितनानम रषट्रदी दं श्रार वई नतुल्मी-दरिनः यदे मह्त्का प्रयटै। दमम प्रान सम्यदकी वातां ष्टा विप एरिणान ष्ौतादटै।'

जोप्रन-सामग्रो १६

कितु खेद है इस चहत्‌ परध के एक लास तेतीस टजार नौ वासठ उदार छद मे से हमे केवल श्रवध-सड के ४२ चैपादये शरीर ११ देको देते का सौभाग्य पराप्त हुमा रै, जिन सवय इदरदेव- नारायएजी ने जक्तलंसमे दे दिया है। यै देहेचैपा्यो इस पुस्तक पहले परिशि्टमे दी गरईैहै। शेप “उदारः छ्दोकोा जगत्‌ सामने स्ने की उदारता उन्दने नही दिखाई है उक्त श्रथ को भी खय शद्रदेवनारायणजी के भ्रतिरिक्त श्रीर किसी लब्ध प्रतिष्ठ क्षेखक मै नहा देखा रै। सभवत वै उसकी जांच कराना पसद्‌ नहा करते}! उस विपय के पत्रालाप से भी उन्हे श्राना- कानी रै] इसलिये यट निश्चय नही किया जा सकता रै कि प्रथ कहां सक प्रामाणिक रै इस प्रथकेजे छद छप चुके इ, उनमें तुनसीदासजी के जीवन की घटना दौ हुई षे राज तक्र फो विचार्यो मे बहत उलट फर उपस्थित करती हे श्ददेय- नारायणजी कौ प्रांतीय स्वजन लाला रिवनदनसदहाय मे इस प्रथ की प्राप्नि फे विपय मेज कुद लिखा बह मन मे सदेह उत्पन करता है। वे किपते ६--

ष्टमक्ञतहुश्राहति केसरिया (चपारन >) निवासी वान. ददर दवनारावश गेसादेजी किती चेले की, पक लाख देह चोपाड्ये( मे लिपी हु, गोसा्दजी की जीयनी प्राप्त हुदै >। सुनते षह गोमा्ूनी परै उसके प्रचार 7षहोपकाशापदियाया, कितु लेर्गो के श्चुनय विनय से राप माचन वा समय सनत्‌ १६६७ निर्धारिते कर दिया तव्रे उसकी र्ता फा भार उभी मे को सैषा गया निम्ने मोसादईनो को श्रोदयुमा-जी से मिरे का उपाय वता श्रीप्रमचद्रजी के दश॑न का उपाय बताया था वह्‌ पुम्तङ भूदान फे किसी ब्राह्मण ये घर पदी रही पूरु सुरीजी उसके अाल्कों फे रिच घे सालं से पुस्त का पता पाकरं उन्न उषकी पूरौ मक्ल कर्‌ डाली दस गुरुतर श्रपराध से क्रोधिन हते वइ बाद्ण उनके वध कै निभित्त उत

२० गोखमी तुलसीदास

श्रा ते सशीजी वरदा से चपतदहो गण1 वही पुम्वम किसी प्ररार श्रल्यर पर्ची शार फिर पूरवाक्त वायु साहव के हाय लगी क्या हम श्चपा स्वजातीय इन सुशीजी की चतुराद शरैर बहादुर की ध्रशयानवरेे१ उरहेनि सारी ुन्तक नकल कंर ली, तय तरे व्राहण देवता के काना तक समरन परुषी, श्रार जब भागे तेः श्रपन वेररिद्‌ वस्ते के साथ उस ब्हरफायम्रयको मीसेते इए \ दके साथ ष्टी क्या अपन दूसरे भारे यो यह श्रभरुतपूद चरे चरम्य पुस्तक हस्तगते करन पर वधाइ देनी चादिए परप्रंत ने उमकी केसे रषा की शौर वदं उप व्राह्मण के घर कैसे पर्ुची ? यह कषु हमारे सवाद्‌ दातानेष्टम नक्ष उताया। जेाष्ठी, जिस प्रती बद्रलत स्मरद्घ हुध्रा, उसके साथ गोसदिजी ते यथोचित प्रदयुपङार्‌ नहीं किया) वनगरही त्था फेशत्रदाम फे समान उस उद्धार का उपयोग ता भला करते, उलटे उसके मायं ३०० वपं तङ श्चपनी जीयनी की र्ता का मार टाल दिया ॥'* श्रभो थोडे दिन हए, गोसारई्जो फे एक श्र शिष्य वारा वेगी. माधवदास को निमा एफ प्रथ मित्ता जिसको जोच रोनिग किसर प्रकार की श्रङ्चन नी रै) इस प्रय का नाम मूल गोसाई चरिन! रै! हमको जनता कौ समक्त प्रकोणित करके उनाय फे वसील पडिव रामकिणोर शक्न, तुनसा-तरेमियो फे हार्दिक धन्ययाद फे भाजन हण हं चकन सादम मे इमे श्रपने सपादित रामचरितमानस फो श्रारम में दिया ई, नवनेफिणोरप्रेम लसननञ मे प्रकापित हश्रा मून गामाई चरित में ग्चना-कान च्चीर प्रथारेयय य! दिया ई-- + सार स्मि सित, नवमी कानि माम पिरया यदि निन परार दित वेणीमाधवदाम पदनि गमरिजोर णुक्ने पतो उणीमाधवदाम का प्रमि कनस- मदन श्रयाध्या मदात्मा बालकगमं विनायक्जी प्राप्न घा। मदात्मानोकौषपाम नर्त प्रतिकादेग्ये कामे भौ मास्य मिनद तिम द्रति मयद्‌ श्रनि निमा गड थो यह मौना मस्य,

जीवन सामपरी २१

पेस्ट ब्रोष, जिला गया के पडत रामाधारी पौडय के पास रै। पाडेयजो ने क्लि रै सि यह प्रति उनको पिता के! गोरपपुर मे किसी से प्रप्र हु थौ ठव से बह उनऊे यद रै श्रीर्‌ निरति उसका पाठ होवा है। पांडेयजी इस प्रति की पूजा स्पते ₹, दमसे वह्‌ बाहर तेः नरी जा सकती, पयतु यदि कोई उसे वहो जाकर देषा शरीर जचना चारे फसा कर सकना रै

जच कराने से ज्ञात दघ्ना रै कि यह प्रति पुराने देशी कागज पर दैवनागरी ग्रो भे लिसी रै। इसमे ६१ १५१" यो कार पो ५४ प्रद) प्रत्येक पृष्ठमे १० पक्ियहै। ग्रथ की पुस्पिकासे ज्ञातहिता रै कि प्रति सवत्‌ १८४८ की विजयादशमी षेए समाप दुई थो ! दसे किसी पडत रामरतासणि शरीर उनके पुत्र रमादाम ने लिखा था

बाबा वेणीमाधव्रदास पसका गौव के र्टनेपाले थे। उन्तने श्ासाई चरिनि' नाम सं गेसाईूजी का एक मरत्‌ जौवनचरित प. बद्ध करके लिखा था, जो श्रव कटा नह मिता मूल गोसाद - चरित इसा यडे घरिति का सतिप सरफरण जान पडता र। इसे बरणौमाधवदास मै निय पाठ के लिये स्वाथा। गोमाई-चरित का मवसे पटला उस्नेख शिवसि सेगर ने शगिवमि हसरोजः मे किया था। उन्होने खय इसे देखा था पर इस (देगनेः मे भ्यानपूर्वंक पढना भी सम्मिलित ह, उसमे रमे सदेहं 2, कर्योकि मोमाद्मी ये जन्म का दी सवतत, जा शिवसिह ने दिया है वर्‌, बाना वेगीमापव- दास को मृल गोमाईै-चरिसि से नहा मिनता परतु यह भूल अन्य कई कारणो सेभो दहो सकती ह1

मूल गोसाई-चरित से इम बात का सङेत मिलता & ति मामज से वेणोमायवदाम कौ पहली भेट सयत्‌ १६०६ श्रीर्‌ १६१६ के चौय थौ सभवत इसी समय वे उने धिय

२२ गोस्यामी तुनसादास

भी हुए हा] गासाईनी की मृत्यु मर्वसम्मति से मवत्‌ ६८० में हई निम व्यक्ति रा अपने चरिवनायत सै ६४-७० चप फा दौर्भकालीन सप्र रहा उसके लिखे जोवनचरिच कौ प्रामाणिकता पिप्य मे सदेह के लिये बहुत कम अवकाश हो मक्ता है। यदि यह मूल चरित प्रामाणिक हा तो आर्यं कौ घात होगी गोसाई-चरित तुलसीदासजी कं जीरन रौ भितनी तिधियां दौ गद्‌ सव गणित के श्रनुसार ठीक उतरती ₹ं। जिन विधिये कौ प्रामाणिकता के मवध में नागरीप्रचारिणी पत्रि, भाग 9), धर० ३६५--ध्८ शरीर ४०१--०२ मे सदेट प्रकट कियागया या, पे भी पडित गोरेनान् तिगरी कौ गणना के भ्रनुसार ठीक उतग्ती (मा प्र प०, भाग, प्र० ६०.६८) 1 तिथियों पर यथास्यान परिचार शिया जायगा गोसार्दूनी ने म्रपन विपय में विनयप्रिरा, कपिवावना, टरनुमानयाट्क श्रादिप्रथांम जा जा वातं निगमौ र, मृन चरितमे दी हई पटनाग्ना से उनङौ भौ सगपि ठीक यैठ जाता इममे मदैह ना कि गामाई-वरिि वहत सी बाते श्रनीसिर ध्रार श्रममबरं। मदात्माप्र के गिपयमें कड श्रनीक्रिक श्चर चमत्कारी बातें मदन दौ फैल जाया करत शरीर गुम कौ मदिमा छा वरान कें निये गिघ्य-समुदाय उन पर वटव गौमि विश्वास कर यैटवार। इम वैलानिम युग फे ि्यां वरु में यट बान पादु जाती ६। फिर सव्रदवी गवान्दौ कं परम श्रद्धा-गोन शुस्मच वाया वग मापय्दाय स, ता न्रपने गुगक चरित्र का निन्य पाट्‌ फरना स्वाध्याय का श्रावदयक गं समभन #+0 इम वानेकापयाजाना कोट श्राण्यय षतौवान नदींई1 यदि इन श्रम्वामाव्रिक शार श्ररीकिरु वानां कार हम -न्देम्हाद्दगदं दा यह मारा त्रिय मृन्यवाक्षा परिचिददेनाद्ा कटा नापगा वाम्त्द मे मून गामाईचरिनिस

जीवनसाथी २३

ही हमे वुनसीदासनी फे चरित किये आधार मिता ऽस मूल षरित की पूरी प्रपिक्िपि, जा पडत रामधार परिय कौ ठीस नरन , इस पुस्तरु के दृसरे परिगिषट दौ नती है

वुलसीदासजी फे जीवन फौ जो कटं मामप्रौ भ्राज सफर उपल्ध उसका दत्से उपर कर दिया गया ह} इमी के श्राधार प्र उनफ जौवन को पुनर्भिर्माण करना हाया, जिसका प्रयह्म आगे फी धृष्टो मे करियाजकाद।

(३) जन्म

यमुना के तट पर राजापुर नाम का एक बडा गँवहै। यदह गावं बाँदा जिले कौ मऊ तहसील मे बसा हश्मारै। जो० ब्राई० प° रेलवे लाइन से वाँ फे लिये जाना हाता रै। करी स्टेशन से शाजापुर तफ १८ मील लबी णक श्रच्छी कच्चा सडफ चला गई है। यह गोव सृब सखद दहै श्रौर ष्क खासा श्रच्छा नगरसा क्लगतारै। राजापुर का पना श्रलग डाकपर भीरै। याँ एक मकान रै जिस पर लगी हई सगमरमर कौ तरती बतातौ रै सि उसमे श्रीर मानो से कुद गिशोपता है। इस मकान फे साथ बहुत पुरानी स्तिया लगी हई ई, जिनके कारण प्रत्येक शुगम्राही, प्रत्येक दद्‌ श्चीर प्रत्येक हिदीभापौ के हृदय उसे देखते दी उन्नास कौ तर्ग-मानाः उठने लगती यट मकान तुनसीदासजो फीकुली फो नाम से प्रसिद्ध दई कते है, शील शरीर सतापका मर्व, रदत सरक शरीर पिदा गौरव गासाई तुनमादासज। इसा कटा में रहते ये उन्हा फो स्यृति-रचा कं तियेराज्यका श्रारसे उमट्टा पर सगमरमर फो तव्ठो लगाई गई। चौधर जननान, निने श्रधिकार मे ्राजफ़न यहे मान है, गासार्पूजी के शिध्य गगपतिनौ उत्तगधिकारौ कह जति रै। इसा कुशी फो कारण श्राज इम गाव का इतना मद्र डईै। वहतसनाग सनापुर इम मद्र फा दछानरर शरीर स्याना फा दैना चादतं ६। बाद गिदनदनमदहाय मतन तारा तुनसादामजा का जन्मम्दान ६। काद दन्िनापुर श्रार काइ चिव्रकृद फे पाम दाजी. पुर का उनका नन्मग्यान ममभवे ई, परनु इनक पत्त काद्‌ ण्स प्रमा नी मिनन॒र्िये रानापुरक मर्व कफा ग्रपना मर

जन्म भि

विक्रम कौ सोलदवीं शताब्दो मेँ भी यद गव बहुत स्द्ध था बह दोश-माटा पुर ही था! भूल गोसाई -चरित से पता चत्ता & कि व्ल सभी जातिया के लोग सुख-सतेप श्चीर सौहादं साय रहते धे! परु यदौ को प्रस निवासी दषे धे इसन्निथे यह बो का पुसा, कनावा था इसी गब मे तुलसीदासजी के मितारहतेथे। वे धर्मात्मा, पुण्य परायण शरीर दिद्रान्‌ भेता तीणनपुर के राजा के गुरु थे। जनश्रुति फो ब्रतुनार इनका नाम द्रात्माराम दषे था। तुलसी-चरित मे उका नाम युरारि मिश्र क्िपारै। उसी चरित के श्रनुसखार इनके पुरुपा कसया गौव से श्माकर यहो बसेथे। सरयू नदी के उत्तर काभाग सस्यृपारया ससार क्लाता 1 वहो उस समय मभ्तौलौ नाम फा एक छोटा राज्य था] मभोनी राजधानी काभो यदी नाम है! यहाँ से तेसं मील कौ दूरी पर रसया प्राम बसा था \ श्राजकल इम गव की स्थिति करो शरीर कसी है यह नही कहा जा सकता क्या यह बोद्ध इतिदास मे प्रसिद्ध कसीनगर हीते मी रै१ यह सुरि मिश्र के पितामह परशुराम मिश्र रहते ये परशुराम गानाके मिश्रथे श्रीर यत्तमे गणेश का भाग पततिथे। पर्‌ उम दिनो बहो बौद्धश्रीरजेनधर्मो का भी कद्र प्रचार था जिससे परशुराम को परिताप होता था] तिरसर वर्प की श्रवर्था तफ जब इनके कोड सतान नही हुदै तब ससार इन्दे स्प्र के समान कगे लगा। पुत्र की कामनासे ये अपनीखी को साथ लर सीर्थाटन करने निकले शरीर धूमते षासते चित्रकट पर्व वहीं स्वप्र मे हलुमानजी हे दगैन दिण श्र राता दौ सि राजापुर जाकर निवास करो, वद दुन्टारी चौथो पीढी मे एक सुनिराज का जन्म होमा। इससे इन्हें सतोष छ्रा। श्रनेक सयौ का दैन करते

हए ये सीतापुर पर्हैचे निसके पास दी नैमिषारण्य तीथे 2। तीखन- :

गोखामी तुनसीदास

पुर के राजा, जिनके राज्य मे राजापुर गाँव बसा हुश्रा था, उन दिनी बही श्राएहृएयथे। परशुराम उनसे मिले श्रौर श्रपने स्न का सारा वृरत्ताति सुनाकर उनसे राजापुर मे रहने कौ इच्छा प्रकर की राजा रुन्ञ थे उन्हनि देखा कि परशुराम सव शाख श्रीर दीन मे पारत इसनिये वै उन्ह॒श्रपने साथ तौखनपुर ले श्राए शरीर उन्होने राजापुर मे उनके रहने का समे प्रवध बडे सम्मान के साथ कर दिया। वरँ परशुराम मिश्च ने गिव शक्ति की शुद्ध उपासना चलाई कंललासवासी मादेव के उन्हे साक्तात्‌ दर्भन हण राजपुर मे उन्दँ ण्क पुन-रत का क्षाम हन्ना शकर मिश्र कलाया अ्रत्यत वद्ध हा जाने पर गिवभक्त परशुराम श्रपना पुर राजा को सौपकर मेोत्तदा पुरी काशो चले श्राए शरीर बँ परमगति फो प्राप्त हए शफर मिश्र भो वडे प्रसिद्ध पडत उन्हें वाणो सिद्ध धी। राना-रानी श्रीर राज्य कं सब कर्मचारी उनके शिष्य हो गए उनफे दो व्याददह्ण। पनी पतौ के मर जाने पर अन्हनिश्रपनी चारा मानी के साथ निवाह फिया। पटनी खोसेदो लडकश्चीरदो लड परियां हई तुलसीदासजी फी शाखा दृसरी चलो जिससे सत मिश्र श्चीर स्दरनाच मिश्र दो पुत्र उत्पत हए श्रपनी पिदया-वुद्धि से उने सृथ धन धरणो का लाम श्रा स्दरनाय चार पुत्र हृण। मघम उठे का नाम मुराग्िमिश्रघा। यद्दा मासाई तुनसादास केपिताये। गामाईजी तोन भदश्रीरदावटन थीं। णक भाद उनसे द्यारा घाश्ररदे वड मवमे वड़े माद्‌ कानाम गण पनि धा, दृमर का महग श्र सवम द्याद का मेगन। इनरी बहना फानाम वायोश्रीरव्ियाया। वे उद क्न मे -यादा गई यद बश-परपरा लुनमा चरि मदा हूड्‌ ६। पर इमा सम अमद्धीर कही मन्दी दाना। वह प्रमी श्रानाचमोंका दि

जन्म

से यवक द्मा रै! इमलिये सेद है किः हमं इस परपरा कतौ मारकर तह मके मूह्न मोसारं -चरित से गोमाइनौ की दशल इते विन्नार मे दौ जितम विष्ठार से हुनसी चर्विमे दी हरै! सचिन चरित होन के कार्ण यहद भौ नटः जा सरूती यी, परतु जे कु इस विपथ मे उसमे निसा है शमे विरुद्ध दी पडता षै! वेणोमाधवदास ने गोसारईजी पो पुर्यो फा फसया यहा, पयाजा र्ना करा शरीर उनके घन का ग्रहन करसे षठनाया है- प्म थान प्तेनि दहे इरे तेहि ते इट नाम पदयो सुरते +"

यद्यपि वेणीमाधवदात ने कदी मी तुनसीदासजी को दवै नटी कटा द, फिर भी पयोजा सै उनकी बश-परपरा फो श्रासम करना इन्द वू कहने ही बराबर र! कारलिह्व स्वामी ने मी करा र-- पुनी पराशर मोत दुवे पतिश्रोजा फेः! सभर रै, घडे चरथ भ-- जिसका भ्मृल चरिन' सैष --उनको स्पष्ट द्धे लिला द्य ! पस्तु भिश्र-बुर्रो की जच पडतल से क्षात रोता है करि बदा मिला शरीर रजाधुर फो हद पिद कान्यङन्न द्विवेदिया कौ वस्ती १, सर- करिये की नहा} क्षरवरियो फो भी उधर कमी नह है, परयै द्विव नही है रजा प्रतापरसिह ने इन्दे इसी सिये कदाचित्‌ कान्यक्न्भ निपा है! इसी आधार पर मिश्र-वधुग्रौ फा भी राजा प्रवामनिर्‌ का समयेन करना पडा र] यर गोमारी राजापुर भी ससस्य प्रसिद्ध वेीमाधवदासत नख से राजपुर मे सरलसिया द्वियेदिमो ष्ठे अभाव क! क्ठरप उनसर वथ का स्ट होना राया ज्ञाता! ुनसादासजो के जन्म लेने केतं मास फँ भीनर्‌ उनके पित्ता भ्र गर शरैर देम षप दो भीतर उनके वश्च ष्ठी कानाशहोगया था} तएव उन्टे द्विवेदी मानसे मे कई

+ गोखामी तुलसीदास

जा लोग उने (जायो मगन कुलः कहने से उनो सचयुच भिखमगे कौ सतान कह डालते ह, वे उन्टी के "दियो सुन जन्म सरीर सुदरहेतुजा फन चारि को" वाक्य से भी कुं परिणाम निकालते रया नहीं, यर नदा कहा जा सकता सुकुल, से याँ “शुक्त, जाति मरही, केवल अच्छे, उच्च कुल से श्भिप्राय है

शरीर जे कख हो, इस बातमे तो कुक भी सदेह नहीं क्रि त॒लसीदासजी सरयूपारौ